Rigveda, Yajurveda, Samaveda and Atharvaveda

Monday, 5 September 2016

Vedas in Hindi - संपूर्ण वेद कथा !

By 22:09
परिचय - वेद दुनिया के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं। वेद ही हिन्दू धर्म के सर्वोच्च और सर्वोपरि धर्मग्रन्थ हैं। सामान्य भाषा में वेद का अर्थ है "ज्ञान"। वस्तुत: ज्ञान वह प्रकाश है जो मनुष्य-मन के अज्ञान-रूपी अन्धकार को नष्ट कर देता है। वेदों को इतिहास का ऐसा स्रोत कहा गया है जो पोराणिक ज्ञान-विज्ञान का अथाह भंडार है। वेद शब्द संस्कृत के विद शब्द से निर्मित है अर्थात इस एक मात्र शब्द में ही सभी प्रकार का ज्ञान समाहित है। प्राचीन भारतीय ऋषि जिन्हें मंत्रद्रिष्ट कहा गया है, उन्हें मंत्रो के गूढ़ रहस्यों को ज्ञान कर, समझ कर, मनन कर उनकी अनुभूति कर उस ज्ञान को जिन ग्रंथो में संकलित कर संसार के समक्ष प्रस्तुत किया वो प्राचीन ग्रन्थ "वेद" कहलाये। एक ऐसी भी मान्यता है कि इनके मन्त्रों को परमेश्वर ने प्राचीन ऋषियों को अप्रत्यक्ष रूप से सुनाया था। इसलिए वेदों को श्रुति भी कहा जाता है। 
          इस जगत, इस जीवन एवं परमपिता परमेश्वर; इन सभी का वास्तविक ज्ञान "वेद" है। 

वेद क्या हैं?
           वेद भारतीय संस्कृति के वे ग्रन्थ हैं, जिनमे ज्योतिष, गणित, विज्ञान, धर्म, ओषधि, प्रकृति, खगोल शास्त्र आदि लगभग सभी विषयों से सम्बंधित ज्ञान का भंडार भरा पड़ा है। वेद हमारी भारतीय संस्कृति की रीढ़ हैं। इनमे अनिष्ट से सम्बंधित उपाय तथा जो इच्छा हो उसके अनुसार उसे प्राप्त करने के उपाय संग्रहीत हैं। लेकिन जिस प्रकार किसी भी कार्य में महनत लगती है, उसी प्रकार इन रत्न रूपी वेदों का श्रमपूर्वक अध्यन करके ही इनमे संकलित ज्ञान को मनुष्य प्राप्त कर सकता है। 

वेद मंत्रो का संकलन और वेदों की संख्या 
            ऐसी मान्यता है की वेद प्रारंभ में एक ही था और उसे पढने के लिए सुविधानुसार चार भागो में विभग्त कर दिया गया। ऐसा श्रीमदभागवत में उल्लेखित एक श्लोक द्वारा ही स्पष्ट होता है। इन वेदों में हजारों मन्त्र और रचनाएँ हैं जो एक ही समय में संभवत: नहीं रची गयी होंगी और न ही एक ऋषि द्वारा। इनकी रचना समय-समय पर ऋषियों द्वारा होती रही और वे एकत्रित होते गए। 
           शतपथ ब्राह्मण के श्लोक के अनुसार अग्नि, वायु और सूर्य ने तपस्या की और ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को प्राप्त किया। 
प्रथम तीन वेदों को अग्नि, वायु और सूर्य से जोड़ा गया है। इन तीनो नामों के ऋषियों से इनका सम्बन्ध बताया गया है, क्योंकि इसका कारण यह है की अग्नि उस अंधकार को समाप्त करती है जो अज्ञान का अँधेरा है। इस कारण यह ज्ञान का प्रतीक बन गया है। वायु प्राय: चलायमान है, उसका काम चलना (बहना) है। इसका तात्पर्य है की कर्म अथवा कार्य करते रहना। इसलिए यह कर्म से सम्बंधित है। सूर्य सबसे तेजयुक्त है जिसे सभी प्रणाम करते हैं, नतमस्तक होकर उसे पूजते हैं। इसलिए कहा गया है की वह पूजनीय अर्थात उपासना के योग्य है। एक ग्रन्थ के अनुसार ब्रम्हाजी के चार मुखो से चारो वेदों की उत्पत्ति हुई। 

१. ऋग्वेद 
ऋग्वेद सबसे पहला वेद है। इसमें धरती की भौगोलिक स्थिति, देवताओं के आवाहन के मंत्र हैं। इस वेद में 1028 ऋचाएँ (मंत्र) और 10 मंडल (अध्याय) हैं। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियाँ और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है।


२. यजुर्वेद 
यजुर्वेद में यज्ञ की विधियाँ और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। इस वेद की दो शाखाएँ हैं शुक्ल और कृष्ण। 40 अध्यायों में 1975 मंत्र हैं।


३. सामवेद 
साम अर्थात रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं (मंत्रों) का संगीतमय रूप है। इसमें मूलत: संगीत की उपासना है। इसमें 1875 मंत्र हैं।


४. अथर्ववेद 
इस वेद में रहस्यमय विद्याओं के मंत्र हैं, जैसे जादू, चमत्कार, आयुर्वेद आदि। यह वेद सबसे बड़ा है, इसमें 20 अध्यायों में 5687 मंत्र हैं।

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Thursday, 5 May 2016

ब्रम्हांड और उसकी उत्पत्ति - नासदीय सूक्त, ऋग्वेद(10:129)

By 13:25
Image Credit : NASA/JPL-Caltech
       
            ब्रम्हांड एक खुला स्थान है, जिसकी कोई सीमायें नहीं हैं, कोई अंत नहीं है। इसकी लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई और गहराई अनंत हैं। पर इसकी रचना कैसे और क्यों हुई? नासदीय सूक्तः जो की सृष्टि की रचना के मंत्र के रूप में भी जाना जाता है, ऋग्वेद के 10वें मंडल का 129वां सूक्त है। इसका संबंध ब्रह्मांड विज्ञान और ब्रह्मांड की उत्पत्ति के साथ है। नासदीय सूक्त में कुल ७ मन्त्र हैं:-

नासदीय सूक्त के ७ मंत्रों की हिंदी में संछिप्त व्याख्या :

१. नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् ।
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम् ॥ १॥


इस जगत् की उत्पत्ति से पहले ना ही किसी का आस्तित्व था और ना ही अनस्तित्व, मतलब इस जगत् की शुरुआत शून्य से हुई। 
तब न हवा थी, ना आसमान था और ना उसके परे कुछ था,
चारों ओर समुन्द्र की भांति गंभीर और गहन बस अंधकार के आलावा कुछ नहीं था। 


२. न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः ।
आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किञ्चनास ॥२॥


उस समय न ही मृत्यु थी और न ही अमरता, मतलब न ही पृथ्वी पर कोई जीवन था और न ही स्वर्ग में रहने वाले अमर लोग थे,
उस समय दिन और रात भी नहीं थे। 
उस समय बस एक अनादि पदार्थ था(जिसे प्रकृति कहा गया है), मतलब जिसका आदि या आरंभ न हो और जो सदा से बना चला आ रहा हो।

३. तम आसीत्तमसा गूहळमग्रे प्रकेतं सलिलं सर्वाऽइदम् ।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम् ॥३॥


शुरू में सिर्फ अंधकार में लिपटा अंधकार और वो जल की भांति अनादि पदार्थ था जिसका कोई रूप नहीं था, अर्थात जो अपना आयतन न बदलते हुए अपना रूप बदल सकता है। 
फिर उस अनादि पदार्थ में एक महान निरंतर तप् से वो 'रचयिता'(परमात्मा/भगवान) प्रकट हुआ। 

४. कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् ।
सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥४॥


सबसे पहले रचयिता को कामना/विचार/भाव/इरादा आया सृष्टि की रचना का, जो की सृष्टि उत्पत्ति का पहला बीज था,
इस तरह रचयिता ने विचार कर आस्तित्व और अनस्तित्व की खाई पाटने का काम किया। 

५. तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासीदुपरि स्विदासीत् ।
रेतोधा आसन्महिमान आसन्त्स्वधा अवस्तात्प्रयतिः परस्तात् ॥५॥


फिर उस कामना रुपी बीज से चारों ओर सूर्य किरणों के समान ऊर्जा की तरंगें निकलीं, 
जिन्होंने उस अनादि पदार्थ(प्रकृति) से मिलकर सृष्टि रचना का आरंभ किया।

६. को अद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः ।
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव ॥६॥

अभी वर्तमान में कौन पूरी तरह से ठीक-ठीक बता सकता है की कब और कैसे इस विविध प्रकार की सृष्टि की उत्पत्ति और रचना हुई, क्यूंकि विद्वान लोग तो खुद सृष्टि रचना के बाद आये।  अतः वर्तमान समय में कोई ये दावा करके ठीक-ठीक वर्णण नहीं कर सकता कि सृष्टि बनने से पूर्व क्या था और इसके बनने का कारण क्या था।  

७. इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न ।
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद ॥७॥


सृष्टि रचना का स्रोत क्या है? कौन है इसका कर्ता-धर्ता?
सृष्टि का संचालक, अवलोकन करता, ऊपर कहीं स्वर्ग में है बैठा।
हे विद्वानों, उसको जानों.. तुम नहीं जान सकते तो कौन जान सकता है?



-Nasadiya Sukta translation - hymn of creation
-nasadiya sukta in hindi
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जीवन का सबसे बड़ा सच और रहस्य - मौक्ष, पुनर्जन्म और मौत..

By 13:20
अक्सर लोग कहते हैं की जीवन का सबसे बड़ा सत्य है - मौत, अगर हाँ तो उसके बाद क्या? स्वर्ग और नर्क क्या हैं? इंसान मौक्ष की प्राप्ति कैसे करता है?

हिन्दू धर्म और विश्व के विभिन्न धर्मो और उनके महान प्राचीन ग्रंथो में जीवन के रहस्य और स्वर्ग जैसी बातो का वर्णन किया गया है जिसमे काफी बातें एकसमान हैं।  ऐसी मान्यता है कि इन ग्रंथो का सारा ज्ञान देवताओं द्वारा खुद दिया गया था।

पुनर्जन्म चक्र - इन ग्रंथों के मुताबिक नर्क यहीं है पृथ्वी पर।  हम सब पुनर्जन्म के चक्र में फसे हुए हैं। हमें करोड़ों बार जन्म और मरण की पीड़ा से गुजरने के बाद इंसान का जन्म मिलता है जैसा की हिन्दू धर्म में भी वर्णित है।  मतलब हमें हजारों सालों बाद मौक्ष का मौका मिलता है इंसानी जीवन के रूप में।

स्वर्ग, नर्क और मौक्ष - ये इंसानी जीवन हमें एक ऐसे मौके के रूप में मिलता है जिसमें हम इस पुनर्जन्म चक्र रुपी नर्क से मुक्ति(मौक्ष) पा सकें।  अपने इंसानी जीवन में सफल होने पे हर मनुष्य स्वर्ग का हक़दार बनता है और इसी को हम मौक्ष भी कहते हैं, मतलब पुनर्जन्म चक्र से मुक्ति, अन्यथा मनुष्य को जन्म और मृत्यु की पीड़ा का सफर जारी रखना पड़ता है क्योंकि आत्मा तो अमर होती है।

मौक्ष की प्राप्ति - हमारे जीवन से तुलना की जाए तो आत्मा अनंत तक रहती है, मतलब जो व्यक्ति स्वर्ग में जाता है वो वहां अनंत तक रहता है।  इसलिए अनंत तक आनंदमयी रूप से स्वर्ग में रहने के लिए किसी को भी अपने लालच और कामनाओं पे काबू करना आवश्यक है।  इसका मतलब साफ़ है की स्वर्ग में जाने और मौक्ष की प्राप्ति के लिए वही व्यक्ति योग्य होगा जो अपने लालच और कामनाओं पर काबू पा ले और सुख-दुःख को एकसमान समझे।
इंसान की जिंदगी में इतने लक्ष्य होते हैं की वो कभी खुश ही नहीं रह पाता।  ९०% तनाव और दुःख सिर्फ हमारे सोचने के तरीके और जीवनशैली पर निर्भर करता है। सिर्फ भारत में ही हर साल हज़ारों लोग कुपोषण और भूक से मर जाते हैं, कोई ज़रा उनसे पूछे की उनके जीवन का क्या लक्ष्य है तो उनका बस एक ही जवाब होगा - पेट भर के खाना।
ये बात भी सच है की अगर इंसान में आगे बढ़ने की चाह न होती तो आज हम अपने जीवन में इतनी तरक्की और सुख सुविधाएं न जुटा पाते, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है की हम अपनी इंसानियत से ऊपर उठकर अपने लालच और कामनाओं को ही अपनी जिंदगी बना लें, क्योंकि इनकी कोई सीमा नहीं होती जिस्से हमें केवल असन्तुष्टि ही प्राप्त होती है।

मुक्ति किसको कहते हैं?
जिस से छूट जाना हो उस का नाम मुक्ति है।
किस से छूट जाना?
जिस से छूटने की इच्छा सब जीव करते हैं।
किस से छूटने की इच्छा करते हैं?
जिस से छूटना चाहते हैं।
किस से छूटना चाहते हैं?
दु:ख से। 
छूट कर किसको प्राप्त होते हैं और कहाँ रहते हैं?
सुख को प्राप्त होते और ब्रह्म में रहते हैं।
मुक्ति किस को प्राप्त नहीं होती?
जो अधर्म और अज्ञान में फसा हुआ जीव है।

अर्थात  अधर्म , अविद्या, कुसंस्कार, बुरे व्यसनों से अलग रहें और सय्तभाषण, परोपकार, विद्या, पक्षपातरहित न्याय, धर्म की वृद्धि में अपना आचरण रखें।





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हिन्दू धर्म और कलयुग

By 13:13
सबसे बड़ा धर्म है इंसानियत का और इसमें कोई शक नहीं है की इस धर्म को मानने वाले ही कुछ सभ्य लोगों ने निर्माण किया होगा महान हिन्दू धर्म का, ताकि ज्ञान रुपी प्रकाश पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहे.…
हिन्दू धर्म को दुनिया का सबसे पुराना धर्म माना गया है। हिन्दू धर्म के प्राचीन ग्रन्थ ज्ञान का अथक भंडार हैं।

इन सबके  बावजूद भारत और बाकि दुनिया में लालच, द्वेष और पाप बढ़ता ही जा रहा है, तो क्या ये कलयुग की शुरुआत है या अंत?
हिन्दू धर्म के अनुसार कलयुग में इस दुनिया का अंत होगा जब धरती पाप का बोझ सह नहीं पायेगी। दुनिया में क्या-क्या चल रहा है अगर गौर किया जाये  इस्से तो लगता है की कलयुग की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी है।
लोग लालच में गलत काम किये जा रहे है, अपने लालच के आगे ऐसे लोग सही गलत कुछ नहीं सोचते, तो बताइये इंसान और जानवरों में फर्क ही क्या रह गया? इंसान की बदौलत ही हमारी धरती और पर्यावरण लगातार विनाश की और बढ़ रहे हैं।

हिन्दू धर्म में मानवकाल को ४ वर्गों में विभाजित किया गया है:
१. सतयुग  (17,28,000 वर्ष) - (देवताओं का युग) पहला और सबसे अच्छा, सच्चाई और सम्पन्नता का युग जो की देवताओ द्वारा नियंत्रित और परिचालित होता था।  इस युग में इंसानो की औसत आयु  १००,०० वर्ष होती थी।
२. त्रेतायुग  (12,96,100 वर्ष) - त्रेतायुग को 12,96,100 वर्ष का माना गया है। इस युग में सदाचार और नैतिक गुणों की कमी आने की शुरुआत हुई। इस युग में इंसानो की औसत आयु  १,०००-१०,००० वर्ष होती थी। यह काल राम के देहान्त से समाप्त होता है।
३. द्वापरयुग (8,64,000 वर्ष) - द्वापर मानवकाल के तृतीय युग को कहते हैं। इसमें बीमारी, द्वेष और इंसानो में आपसी कलह (युद्ध) सामान्य बात थी। इस युग में इंसानो की औसत आयु  लगभग २००-३०० वर्ष होती थी।  यह काल कृष्ण के देहान्त से समाप्त होता है।
४. कलयुग (4,32,000 वर्ष) - कलियुग चौथा और अंतिम युग है। इस युग में लोग पापी और अपने नैतिक सद्गुणों से वंचित हो होंगे। इस युग में इंसानो की औसत आयु लगभग १०० वर्ष होगी, जो की युग के अंत में घटकर १५-२० वर्ष तक सिमित रह जाएगी।
कलयुग की शुरआत कब और कैसे हुई इसका सटीक वर्णन नहीं किया जा सकता। खगोलशास्त्री और गणितज्ञ आर्यभट्ट के अनुसार कलयुग, ईशा के जन्म से ३२०१ वर्ष पूर्व शुरू हो चूका है।

हिन्दू धर्म के अनुसार कलयुग में जब पाप हद से ज्यादा बढ़ जायेगा तब कल्कि भगवान स्वयं आएंगे इस धरती को पापमुक्त करने।

सटीक कल्पना करना संभव नहीं है, अगर कलयुग की शुरुआत ५-६००० वर्ष मानी जाए तो अभी भी इसके अंत में लगभग ४ लाख वर्ष शेष हैं। दूसरी और वैज्ञानिकों ने भी ये अनुमान है कि ३ से ४ लाख वर्षो में पृथ्वी बिलकुल भी रहने लायक नहीं बचेगी, जिसका एक कारण पृथ्वी का सूर्य के बेहद नजदीक आ जाना भी हो सकता है।








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